गुरुवार, 14 मई 2026

मिथिला और मछली

 

प्रमाण मिलने के बाद क्या आप मछली खाना शुरू करेंगे? मिथिला की धरती पर कण-कण में इस बात के प्रमाण हैं.  रही बात जीव हत्या की तो मृत्यु लोक में एक जीव ही दूसरे जीव का आहार है. यह सृष्टि का नियम है. आप केवल हवा और जल पान कर के जीवीत नहीं रह सकते. 

क्या दूध पीने वाले कह सकते हैं कि वे जीव हत्या नहीं कर रहे? क्या साग-सब्जी-कंद खाना जीव हत्या नहीं है? वनस्पतियों में भी जीवात्मा होती है. उनका जन्म होता है. वे बढ़ते हैं और वृद्ध हो कर मृत्यु को प्राप्त करते हैं.  

आप अपनी इच्छा दूसरों पर न थोपें. यथा हम अपनी इच्छा नहीं थोपते. यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि उसको मांसाहार करना है या नहीं. 

चलिए अब प्रमाण की बात करते हैं.  महाभारत के शल्यपर्व (अध्याय 50-51) और स्कन्द पुराण में सारस्वत ऋषि द्वारा मछली खाकर 12 वर्ष बिताने के प्रमाण हैं. वेदों का अध्ययन करने वाले समस्त ऋषि-मुनि भोजन और जल की तलाश में सरस्वती नदी के तट को छोड़कर अन्य दिशाओं में चले गए. केवल ऋषि सारस्वत (जो देवी सरस्वती के मानस पुत्र माने जाते हैं) अपनी माता सरस्वती के प्रति अनन्य भक्ति के कारण उस स्थान को छोड़कर कहीं नहीं गए. वे वहीं रुककर वेदों का पाठ करते रहे.  

सरस्वती नदी के सूखने के कारण नदी की मछलियाँ तटों पर आने लगीं. सारस्वत ऋषि ने इसे माता की इच्छा समझकर उन मछलियों को पकाकर (आहार के रूप में) ग्रहण किया. इसी कारण अकाल के उस भीषण दौर में भी वे जीवित और पूरी तरह स्वस्थ रहे.  

गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस (अयोध्याकांड) की एक चौपाई में लिखते हैं-  

मीन पीन पाठीन पुराने । भरि भरि भार कहारन्ह आने ॥

मिलन साजु सजि मिलन सिधाए । मंगल मूल सगुन सुभ पाये ॥

अब आप पता कीजिए कि जब भरत जी भगवान राम से भेंट करने जा रहे हैं तो मोटी-मोटी मछली का उपहार क्यों ले कर जा रहे हैं? 

और जानना है? आपको तारा तंत्र और ब्रह्मयामल तंत्र जैसी किताबें पढ़नी चाहिए. इनको हमने नहीं लिखा. ग्रन्थों में ऋषि वशिष्ठ की तंत्र साधना माँ तारा के मंत्र को सिद्ध करने की कथा है. माँ तारा दस महा विद्याओं में से एक हैं. पता कीजिएगा 10 महाविद्या क्या हैं उनकी साधना कैसे की जाती है.  

वैदिक पूजन पद्धति बिना बलि प्रथा के संपन्न ही नहीं हो सकती. बाद के समयों में हमारे धर्म पर बौद्ध और जैन पंथो के अहिंसा का प्रभाव पड़ा और पद्धति बदलती चली गई. प्रमाण अनेक हैं परंतु अपना मूल्यवान समय आप जैसों पर खर्च करने की इच्छा नहीं है.  संक्षेप में आपसे यही निवेदन होगा कि जिस विषय में जानकारी न हो उसमें न पड़ें पहले ज्ञान की प्राप्ति कीजिए फिर अपने विचार व्यक्त कीजिए.  अन्यथा शर्म से डूब मरने वाली परिस्थिती उत्पन्न हो सकती है. जय भवानी...  

रविवार, 18 दिसंबर 2022

भारत फीफा क्यों नहीं खेल सकता ?

 हम अर्जेंटीना और फ्रांस के बीच फीफा वर्ल्ड कप का फाइनल मुकाबला देख रहे थे। कभी मेस्सी के गोल पर तालियाँ पीटना तो कभी एम्बाप्पे की फुर्ती पर। एक रोमांचक मुकाबले में अर्जेंटीना ने फ्रांस को हरा दिया। खुशी से उछल पड़ने का मन किया लेकिन हुआ नहीं। जब तक अर्जेंटीना बढ़त बनाए हुए था तब तक मैं अर्जेंटीना को सपोर्ट कर रहा था। फिर जब मैंने स्टेडियम में मैक्रों को देखा तो फ्रांस के जीतने की कामना करने लगा। फिर फ्रांस ने बराबरी कर ली। एक तरफा हार की तरफ बढ़ते मैच में एक के बाद एक 2 गोल दाग कर फ्रांस ने जान डाल दी। पूरा स्टेडियम मानो रोमांच से भर चुका था। अब मैं भी फ्रांस का तरफदार था लेकिन फिर भी खुशी के उस भाव से नहीं उछल सका जिस भाव से साल 2011 के क्रिकेट वर्ल्डकप के फाइनल मुकाबले के बाद उछला था।

सवाल है क्यों? 



जवाब है क्योंकि अपनी मातृभूमि अपनी ही होती है। क्योंकि न तो कोई आपसे माँ से स्नेह कर सकता है न आप किसी को माता का स्थान दे सकते हैं। माँ तो माँ होती है। भारत माँ भी माँ है। मैं कैसे उछलता मैं क्यों पटाखें जलाता? मैं क्यों नाचता?

हम तो वर्ल्ड कप खेले ही नहीं। हम आर्थिक रुप से दुनिया के अग्रणी देशों में हैं। हम सामरिक दृष्टि से श्रेष्ठ हैं। क्षेत्रफल में भी टॉप 07 में शामिल हैं। जनसंख्या की दृष्टि से नंबर 2 हैं। जल्दी ही नंबर एक होने वाले हैं। इतने लोगों के बावजूद इतने बड़े देश से हम फुटबॉल खेलने वाले 11 लोग तैयार नहीं कर पा रहे हैं क्यों? 

क्यों हम बीसीसीआई की तरह फुटबॉल का एक कंट्रोल बोर्ड नहीं बना पा रहे हैं? 

देश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है यह मैं चैलेंज के साथ कह सकता हूँ। कमी है तो बस प्रतिभा को अवसर देने की। हमें फुटबॉल को प्रोमोट करना होगा। मोहनबागान तक सीमित रह कर हम फीफा नहीं खेल सकते। हमें देश में 11 बाइचुंग भूटिया चाहिए। इसके लिए मेहनत करनी होगी खर्च करने होंगे। बीसीसीआई से पैसा लीजिए सिर्फ रुपए कमा रहे हैं टूर्नामेंट नहीं जीत पा रहे। भारतीय क्रिकेटर जो एड फिल्मों के जरिए करोड़ों कमा रहे हैं उनसे पैसे लीजिए और फुटबॉल के खिलाड़ी तलाशिये, नहीं मिल रहे तो पैदा कीजिए। तय कीजिए कि अगला फीफा हमें खेलना है। हम नहीं कह रहे कि कप लाकर रख दीजिए लेकिन खेलिये तो सही। 

क्रिकेट को तो बर्बाद कर चुके हैं। हर दिन कहीं न कहीं मैच हो रहा होता है एक टूर्नामेंट हारते हैं तो किसी देश में पहुँच जाते हैं। आईपीएल के रुप में अलग पैसे का खेल चल रहा है। क्रिकेट खत्म हो चुका है। अब मन नहीं होता देखने का। अति सर्वत्र वर्जयेत। भारत फीफा क्यों नहीं खेल सकता यह सवाल मन में दोहराते जाईये फिर देखिये भारत कैसे फीफा नहीं खेलता।

शुक्रवार, 11 नवंबर 2022

मेरे गांव का बचपन

 गांव में बीता मेरा बचपन

हरे पेड़ो ने देखा मेरा लड़कपन                               टेस्ट


खेत खलिहान... बाज़ार के पकवान

नदिया  का तट.. कुएं का पनघट.. 


बगीचे का फल.. लहलहाती फसल

 मासूम सी मस्ती..बागों की गस्ती..




जमकर खाई... दूध मलाई 

नीला गगन... खेल में मगन

जमाना सस्ता .. कच्चा रस्ता... 


किनारे झाड़ी.. बैलगाड़ी

टमटम की सवारी... 



गांव का मेला, समोसे का ठेला

अब तक नहीं भूला.. सावन का झूला

    

गांव में बच्चे नहीं रहे 

बच्चों में बचपन नहीं रहा...  




शनिवार, 25 जून 2022

सिनेमा देखने का असभ्य तरीका ज्यादा मनोरंजक होता है... पढ़ कर देखिए


   सिनेमा का प्रभाव हम बिहारियों पर इतना पड़ता है कि पढ़ लिख कर एसडीएम बनने के बाद भी भूत सवार रहता है. शातिर अपराधियों से लेकर बिना हेलमेट बाइक चला रहे किशोरों में विलेन नज़र आता है. फिर वही होता है जो एक विलेन और एक हीरो के मिलन पर होता है, दे दना दन... खैर इस पर फिर कभी अभी विषय अलग है. 

कोरोना की तीव्रता कम हुई तो देश के सिनेमा हॉल फिर से खुले.एक से बढ़कर एक फिल्में आई. खूब संख्या में लोग सिनेमा देखने पहुंचे.कुछ लोगों ने मुझसे पूछा आप कई सालों से सिनेमा नहीं गए आपको तो फिल्मों में बड़ी दिलचस्पी है.मैंने कहा मैं अब सभ्य समाज का हिस्सा बन चुका हूं, लेकिन मुझमे बहुत असभ्यता बची हुई है.सभ्य लोगों के बीच एडजस्ट करने में दिक्कत हो सकती है.थिएटर में सपरिवार फिल्म देखने के पक्ष में भी मैं नहीं रहा... किसी भी असमान्य दृष्य पर आप असहज हो सकते हैं. 

  एक तो फिल्म देखना इतना महंगा हो चुका है कि फिल्में आसानी से 100 करोड़ कमा लेती हैं. साथ में पॉपकोर्न और कोल्ड्रिंक वालों की भी चांदी है. बात पैसों की नहीं है इतना तो कमा ही लेता हूं कि महीने में एक बार पीवीआर में एक शो फिल्म देख सकूं. आजकल के महंगे थिएटर्स में फिल्म बड़े ही सभ्य तरीके से शांत माहौल में देखा जाता है.आप कहेंगे यह तो अच्छी बात है इसमें परेशानी क्या है?  लेकिन मुझे इस शहरी सभ्यता से बड़ी चिढ़ है. यहां लोग जताते हैं कि वे सभ्य हैं.साथ ही वो यह भी जता जाते हैं कि दूसरे असभ्य हैं.मैं असभ्य होते हुए सभ्य लोगों के बीच पकड़ा नहीं जाता.यदि सूट पहन लिया तो लोग अंग्रेजी में बात करते हैं मुझसे, फटी जींस पहनकर कूल डूड भी बन जाता हूं, लेकिन इन सब के बीच हवाई चप्पल पहनकर चट-चट बोलते हुए चलना मुझे फिर से गंवार बना देता है... वो अलग बात है.खैर अब जो है सो है... फिल्म पर लौटते हैं.

फिल्म देखते हुए मेरा फोकस मनोरंजन पर होता है.मुझे यह फर्क नहीं पड़ता की जोर से हंस पड़े तो बगल वाला मुझे असभ्य समझेगा.सभ्य लोग हमेशा नाप कर हंसते हैं.आवाज़ की आवृत्ति (FREQUENCY) तय होती है. 

अब आप ही सोचिए कि स्क्रीन पर बॉलीवुड की खूबसूरत अदाकारा( अपने-अपने पसंद वाली की कल्पना करें) आई और लोगों ने आह तक नहीं भरी. सिर्फ यह सोचकर की बगल वाला क्या सोचेगा.सोचिए पैसे आपने दिए हैं टिकट के और सोच बगल वाले के बारे में रहे हैं.

अब हम बताते हैं फिल्म देखना क्या होता है. 

सिनेमा हॉल के पास पहुंचते ही गुटके व पान के पीक की मिश्रित सुगंध वातावरण में फैली होती है. दूर से अंदाज़ा लग जाता है कि अब सिनेमा हॉल पहुंचने वाले हैं. विंडो पर टिकट की लाइन में कहीं बीच में घुसने वाले से बहस हो रही होती है तो कहीं गाली का मुकाबला चल रहा होता है. टिकट लेने के बाद शुरु होता है इंतजार पहले वाले शो के टूटने का... टिकट पर भले ही आपके सीट का नंबर लिखा हो अंदर जाकर बैठना अपनी ही सीट पर है फिर भी छोटे से द्वार के आगे सबको आगे खड़ा होना है, जैसे ही दरवाज़ा खुले की अंदर की तरफ भागें... 

मुकेश वाला घिनौना विज्ञापन आज भी आता है या नहीं पता नहीं. धूम्रपान रोकने के और भी तरीके हैं. यह बताना जरुरी है कि इतना टार आपको बीमार, बहुत बीमार कर सकता है? आवाज़... बंद करो ये सरकारी परचार...साला, सिनेमा चालू करो....

सभ्य दर्शकों के थिएटर में भी यह विज्ञापन दिखाया जाता है. अंतर यह है कि वहां जानू और बाबू लोग कोहनी मार कर कहती हैं देखा..देखा न? वैसे हाईब्रिड बेबी, जानू और बाबू लोगों को स्मोकिंग कूल लगता है.

फिल्म के शुरुआत से ही आम आदमी मस्त एंजॉय करता है. 

जब फिल्म में हीरोइन की एंट्री होती है,तब यह नहीं सोचा जाता कि बगल वाला क्या सोचेगा.तब सीट पर खड़ा हो कर गमछा लहराया जाता है. डायलॉग न सुना जाता है न किसी को सुनने दिया जाता है.  आइटम सॉन्ग पर नर्तकी का पूरा साथ दिया जाता है.सीटी बजा बजाकर नर्तकी को प्रोत्साहित भी किया जाता है. जमकर हूटिंग होती है. शोर में कई बार गाना गुम हो जाता है.

एक्शन सीन में भी 10-10 गुंडो पर हीरो इसलिए भारी पड़ जाते हैं क्योंकि हर मुक्के पर मार...मार का हल्ला मचाकर यही दर्शक उनमें जोश भर देते हैं. आम जनता जिसे आप असभ्य समझते हैं  मारपीट के 2-3 मिनट बाद तक प्रसन्न रहती है. फिल्म देखने का मतलब कहानी देखना नहीं है, फिल्म देखने का मतलब है हीरो दमदार हो, हीरोइन सुंदर हो, आइटम सॉंग हों जिसपर नाचा जा सके और कुछ जोशिले दृश्य हों बस... पैसा वसूल. 

फिल्म ख़त्म होने को आती है. लोग उठ रहे होते हैं इस बीच पैर पर पैर पड़ जाने को लेकर तो धक्का लग जाने को लेकर लड़ाई छिड़ सकती है. इस वक्त सभी अपने आप को फिल्म वाला हीरो समझ रहे होते हैं, जोश हाई होता है. समझाने वाले लोग जब तक मामले को रफा-दफा करा रहे होते हैं... हां भाई, सभ्य लोग जब तक मामले को रफा-दफा करा रहे होते हैं तब तक कहीं से आवाज़ आती है ...मार साले को...और फिर धक्कम-धूक्की होते हुए लोग बाहर निकल कर समझौता कर लेते हैं.कोई फिल्म के गाने को गुनगुनाता हुआ तो कोई एक्शन सीन वाले हीरो की जगह खुद की कल्पना करता हुआ अपने दैनिक रुटिन में विलीन हो जाता है... इंतज़ार होने लगती है अगली फिल्म की... जाईये कभी कृष्णा टॉकिज.

 Rajan Kumar Jha

सोमवार, 2 मई 2022

कोल्ड ड्रिंक

 
कोल्ड ड्रिंक पीने से हमें अनेकों नुकसान होते हैं. वैसे नुकसान तो शराब, सिगरेट और तंबाकू के सेवन से भी होता है परंतु लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं.तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो कोल्ड ड्रिंक से होने वाले नुकसान को नजरअंदाज करना क्षम्य अपराध की श्रेणी में गिना जाना चाहिए.
जिस पृष्ठभूमि से मैं आता हूं. वहां कोल्ड ड्रिंक हाई क्लास सोसाइटी की चीज मानी जाती है.बात 2000-2002 के आस पास की है. बंगाल के छोटे से टाउन अलीपुरद्वार में रहना होता था. मेरी उम्र कोई 7-8 साल रही होगी, कोल्ड ड्रिंक छू भर लेना मेरे लिए रोमांच से भर देने वाला था. पिताजी के यजमान के लाडले के जन्मदिन के अवसर पर हमें भी बुलाया गया था.मुख्य आयोजन शुरू हो रहा था, केक कटने से पहले रक्षा विधान कर तिलक लगाया गया... मंत्रोच्चार के बीच पिताजी ने बर्थ डे बॉय को आशीर्वाद दिया. पिताजी अपने ग्रुप में चले गए और मैं अपने यानी बच्चों के ग्रुप में... बर्थडे पार्टी में परोसे गए पकवान एक तरफ और ट्रे में आती कोल्ड ड्रिंक की शीशी के भितर से छूटते बुलबुले दूसरी तरफ. यह पहला मौका था जब टेलीविजन और दुकानों के भितर सजी बोतलों के बाहर इतने पास से मैंने कोल्ड ड्रिंक की बोतल देखी थी... खुली हुई बोतल जिसमें एक प्लास्टिक की पतली पाइप ( स्ट्रॉ ,उस वक्त पता नहीं था इसे क्या कहते हैं ) हिचकोले खाती इस शीतल पेय पदार्थ की शोभा बढ़ा रही थी. मुझे लगा शायद आज इस बला को मैं मुंह से लगाउंगा भी और चूमूंगा भी. कई बार अगल-बगल से कोल्ड ड्रिंक की बोतलें गुज़री काली वाली, पीली वाली और संतरे के रंग वाली... सोचता कि सभी के स्वाद का अंदाज़ा तो नहीं लग पाएगा यदि मुझे मिला भी तो एक ही बोतल मिलेगा. समय बीत रहा था, कोल्ड ड्रिंक प्राप्त होने की संभावना भी कम होती जा रही थी. जब कोल्ड ड्रिंक मिलने की संभावना ख़त्म होने लगी तो उदास मन को धीरज बंधाने लगा. जिसे मैं जानता तक नहीं, उसके यहां दावत उड़ाने पहुंच गया था यही बहुत बड़ी बात थी. इतने बड़े-बड़े लोग आए हैं, हर किसी के बगल से गुज़रने के बाद अलग सी सुगंध आ रही है. कहां रहते होंगे ये लोग कहां से आते होंगे इनके कपड़े तो देखो मानो अभी-अभी दुकान से लेकर आए हों... इन सब से बचे तब तो मुझे मिले. घर के नौकर ने एक बच्चे को काली वाली बोतल थमा दी, उस बच्चे ने पाइप से एक बार खींचा और खांसने व छींकने लगा. बस फिर क्या कई गणमान्यों ने बिचारे की क्लास लगा दी. बच्चों को क्यों कोल्ड्र ड्रिंक दे रहे हो... मेरी रही सही उम्मीद भी खत्म... खीर पूरी और चना आलू की सब्जी पर फोकस करना ही उचित समझा. मजा तो तब आया जब भोजन करते हुए किसी ने मुझे पहचान लिया, अरे आ तो पंडित जी को छोरो है... कहते हुए उन सज्जन ने रसगुल्ला और गुलाब जामुन थाली में परोस दिया. अब कोल्ड ड्रिंक न पी पाने की उदासी थोड़ी कम हो गई. साथ ही एक नई आशा ने जन्म लिया, शायद यह आदमी जो मुझे जानता है कोल्ड ड्रिंक भी ला कर दे... नहीं... बड़ों की चीज मुझे नहीं मिलेगी, तो क्या हुआ यदि मैं पंडित जी का लड़का हूं.. हूं तो बच्चा ही... खाना समाप्त हुआ. कोल्ड ड्रिंक नहीं मिली... अच्छा हुआ नहीं मिली कहीं मैं भी छींकने खांसने लगता तो , बड़ा अपमान होता... महीनों बीत गए, अब तो यह भी स्मरण नहीं रहा कि कोल्ड ड्रिंक न मिल पाने का मन में कोई खेद रह गया था.अलीपुरद्वार हिंदी हाई स्कूल Alipurduar Hindi Madhyamik Vidyalaya (H.S.) जहां मैं पढ़ाई किया करता था, गर्मी की छुट्टियां शुरु होने वाली थीं. छुट्टियां शुरु होने से पहले क्लास के आखिरी दिन बच्चे अपने क्लास टीचर को छोटी सी पार्टी देते थे. क्लास को साफ किया जाता, सजाया जाता और खाने पीने की सामग्री खरीदी जाती. यह प्रथा किसने कब शुरू की पता नहीं हम तो बस अपने अग्रजों का अनुसरण कर रहे थे. लिस्ट बना, नाश्ते के लिए समोसे, जिलेबी और कोल्ड ड्रिंक मंगाया जाएगा. कक्षा में 90-100 बच्चे थे. 90 प्रतिशत बच्चे मेरी कैटेगरी में थे और बाकी ठीक-ठाक परिवार से आते थे. यही 10 प्रतिशत बच्चे सभी तरह के आयोजनों को प्रायोजित करते थे. आर्थिक कारणों से समोसा और जलेबी के लिए तो बजट का आवंटन हुआ लेकिन कोल्ड ड्रिंक रद्द कर देना पड़ा.इतने सारे बच्चों के लिए कोल्ड ड्रिंक खरीदना बजट के बाहर जा रहा था. तय हुआ कि मास्टर साहब के लिए 10 रु. वाली शीशी ले ली जाएगी. पांडे जी हमारे क्लास टीचर थे और उन्होंने बिना चुनाव करवाए मुझे क्लास का मॉनिटर नियुक्त किया था. हाजरी लगाने के बाद उन्होंने मुझे बुलाया और मुझसे पूछा कि इस आयोजन से पहले क्या तुमने हमारी सहमति ली? मैंने कोई उत्तर नहीं दिया, उन्होंने डांटकर पूछा क्या तुमने अनुमति ली ? और उठने लगे... उनके टेबल पर सज़ा कर रखी गई जिलेबी, समोसे और कोल्ड ड्रिंक का अपमान हो रहा था. समोसे जलेबी से बढ़कर मुझसे कोल्ड ड्रिंक का अपमान नहीं देखा जा रहा था. मैंने उत्तर दिया सर नहीं, उन्होंने प्रेम से कहा लेना चाहिए था कि नहीं, मैंने नज़रें नीची कर के उत्तर दिया... "जी" पांडे सर ने मुझे पास बुलाया और कहा अच्छा लड़का है... उन्होंने समोसा उठाकर मुझे दे दिया .. ले... खा... मैंने संकोच किया परंतु उनकी डांट के भय से हाथ आगे बढ़ा दिया... सर देखते-देखते सारी कोल्ड ड्रिंक गटक गए.. जलेबी सजा प्लेट उठाकर चल दिए... मैं सोच रहा था, सर को यदि मुझे कुछ देना ही था तो कोल्डड्रिंक दे देते, समोसा खुद खा लेते...! इस तरह का आयोजन हमारे स्कूल के हर कक्षा में हो रहा था. भैया लोग यानी 11 वीं 12 वीं की कक्षा में भी... भैया लोगों के सामने वैसी आर्थिक कठिनाईयां नहीं थी जैसी हम बच्चों के सामने में थी. सो उन्होंने कोल्डड्रिंक की शीशी वाली नहीं प्लास्टिक वाली बड़ी बोतल मंगाई थी... वो भी कई सारी... बरामदे से मेरी नजर पड़ी कुछ बच्चों के समूह पर जो एक भैया के पीछे भागे जा रहे थे... भैया के हाथ में संतरे के रंग वाली कोल्ड ड्रिंक की बोतल थी... वो कोल्डड्रिंक लेकर भागे जा रहे थे ठीक उसी तरह जैसे समुद्र मंथन के बाद अमृत कलश लेकर धनवंतरी जी भाग रहे थे... देवता और राक्षस उनके पीछे ...। भैया कहीं ठहरते और 2-4 बच्चों के मुंह में ऊपर से वह दुर्लभ शीतल पेय डाल देते. जिनके मुंह में वह पड़ता निहाल हो जाता. बाकी के बच्चे इस आशा में भैया के पीछे भागते कि अगला नंबर उन्हीं का लगेगा. मैं भी बरामदे से कूदा और अनायास कोल्ड ड्रिंक पिला रहे भैया की तरफ भागा... झुंड में मुंह बाए होड़ करने लगा... आखिर वह क्षण आ ही गया जब कोल्डड्रिंक की बोतल से छलकती हुई कुछ बुंदे मेरी मुंह में गिरी... शीतल... हल्की मिठास लिए...अलग तरह के स्वाद के साथ अमृत समान उन बूँदो को मैंने पूरे जीभ पर फैला दिया... सभी रंध्रों में यह स्वाद कैद हो जानी चाहिए. आज भी कई लोग मुझसे पूछते हैं आप हमेशा ऑरेंज कलर वाली कोल्ड ड्रिंक क्यों लेते हैं? मेरा जवाब- क्योंकि इसका एक-एक बूंद मुझे एक विजेता होने का एहसास कराता रहता है. हो सकता है यह मुझे नुकसान पहुंचा रहा हो लेकिन आज भी इसे पीते हुए मेरे मस्तिष्क में सारी स्मृतियां नाचने लगती हैं. एक-एक घूंट मुझे आज भी प्रफुल्लित कर देता है.

विजयी भवः

सुमार्ग सत को मान कर निज लक्ष्य की पहचान कर  सामर्थ्य का तू ध्यान  कर और अपने को बलवान कर... आलस्य से कहो, भाग जाओ अभी समय है जाग जाओ...