प्रमाण मिलने के बाद क्या आप मछली खाना शुरू करेंगे? मिथिला की धरती पर कण-कण में इस बात के प्रमाण हैं. रही बात जीव हत्या की तो मृत्यु लोक में एक जीव ही दूसरे जीव का आहार है. यह सृष्टि का नियम है. आप केवल हवा और जल पान कर के जीवीत नहीं रह सकते.
क्या दूध पीने वाले कह सकते हैं कि वे जीव हत्या नहीं कर रहे? क्या साग-सब्जी-कंद खाना जीव हत्या नहीं है? वनस्पतियों में भी जीवात्मा होती है. उनका जन्म होता है. वे बढ़ते हैं और वृद्ध हो कर मृत्यु को प्राप्त करते हैं.
आप अपनी इच्छा दूसरों पर न थोपें. यथा हम अपनी इच्छा नहीं थोपते. यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि उसको मांसाहार करना है या नहीं.
चलिए अब प्रमाण की बात करते हैं. महाभारत के शल्यपर्व (अध्याय 50-51) और स्कन्द पुराण में सारस्वत ऋषि द्वारा मछली खाकर 12 वर्ष बिताने के प्रमाण हैं. वेदों का अध्ययन करने वाले समस्त ऋषि-मुनि भोजन और जल की तलाश में सरस्वती नदी के तट को छोड़कर अन्य दिशाओं में चले गए. केवल ऋषि सारस्वत (जो देवी सरस्वती के मानस पुत्र माने जाते हैं) अपनी माता सरस्वती के प्रति अनन्य भक्ति के कारण उस स्थान को छोड़कर कहीं नहीं गए. वे वहीं रुककर वेदों का पाठ करते रहे.
सरस्वती नदी के सूखने के कारण नदी की मछलियाँ तटों पर आने लगीं. सारस्वत ऋषि ने इसे माता की इच्छा समझकर उन मछलियों को पकाकर (आहार के रूप में) ग्रहण किया. इसी कारण अकाल के उस भीषण दौर में भी वे जीवित और पूरी तरह स्वस्थ रहे.
गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस (अयोध्याकांड) की एक चौपाई में लिखते हैं-
मीन पीन पाठीन पुराने । भरि भरि भार कहारन्ह आने ॥
मिलन साजु सजि मिलन सिधाए । मंगल मूल सगुन सुभ पाये ॥
अब आप पता कीजिए कि जब भरत जी भगवान राम से भेंट करने जा रहे हैं तो मोटी-मोटी मछली का उपहार क्यों ले कर जा रहे हैं?
और जानना है? आपको तारा तंत्र और ब्रह्मयामल तंत्र जैसी किताबें पढ़नी चाहिए. इनको हमने नहीं लिखा. ग्रन्थों में ऋषि वशिष्ठ की तंत्र साधना माँ तारा के मंत्र को सिद्ध करने की कथा है. माँ तारा दस महा विद्याओं में से एक हैं. पता कीजिएगा 10 महाविद्या क्या हैं उनकी साधना कैसे की जाती है.
वैदिक पूजन पद्धति बिना बलि प्रथा के संपन्न ही नहीं हो सकती. बाद के समयों में हमारे धर्म पर बौद्ध और जैन पंथो के अहिंसा का प्रभाव पड़ा और पद्धति बदलती चली गई. प्रमाण अनेक हैं परंतु अपना मूल्यवान समय आप जैसों पर खर्च करने की इच्छा नहीं है. संक्षेप में आपसे यही निवेदन होगा कि जिस विषय में जानकारी न हो उसमें न पड़ें पहले ज्ञान की प्राप्ति कीजिए फिर अपने विचार व्यक्त कीजिए. अन्यथा शर्म से डूब मरने वाली परिस्थिती उत्पन्न हो सकती है. जय भवानी...



